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सरकारी आवास से मिली सागौन लकड़ी, पुलिस ने पकड़ा तो वन विभाग की भूमिका पर उठे सवाल! आखिर किसे बचाने की कोशिश, रेंजर की कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान।

PPurna Express DeskNewsroom · Betul, M.P
13 Oct 2026 · 03:20 pm 4 min 00 reading now
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सरकारी आवास से मिली सागौन लकड़ी, पुलिस ने पकड़ा तो वन विभाग की भूमिका पर उठे सवाल! आखिर किसे बचाने की कोशिश, रेंजर की कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान।
(भैंसदेही शंकर राय )बैतूल जिले के भैंसदेही में शासकीय आवास से 23 नग सागौन की चरपट बरामद होने के मामले ने अब कई सवाल खड़े कर दिए हैं। स्वास्थ्य विभाग के रिक्त सरकारी आवास में करीब एक लाख रुपये कीमत की सागौन की लकड़ी छिपाकर रखी गई थी। इस मामले में पुलिस और वन विभाग की संयुक्त कार्रवाई में लकड़ी बरामद की गई, लेकिन सवाल यह है कि जब वन विभाग की बाउंड्री और स्वास्थ्य विभाग का सरकारी आवास एक-दूसरे से सटे हुए हैं, तो आखिर वन विभाग को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? क्या विभाग के मैदानी अमले को इसकी जानकारी नहीं थी, या फिर किसी ने जानबूझकर इस ओर ध्यान नहीं दिया?
पुलिस ने की कार्रवाई, वन विभाग की सक्रियता पर सवाल जानकारी के अनुसार, 8 अक्टूबर 2026 की रात भैंसदेही बीएमओ द्वारा पुलिस को लिखित सूचना दी गई थी कि स्वास्थ्य

 विभाग के रिक्त शासकीय आवास में इमारती लकड़ी रखी होने की जानकारी मिली है। सूचना मिलते ही भैंसदेही पुलिस मौके पर पहुंची और जांच के दौरान आवास में 23 नग सागौन की चरपट बरामद हुई। पुलिस ने गवाहों की मौजूदगी में पंचनामा तैयार कर लकड़ी जब्त की और आवश्यक वैधानिक कार्रवाई के लिए वन विभाग को सौंप दिया।

बरामद लकड़ी की अनुमानित कीमत करीब एक लाख रुपये बताई गई है। इस कार्रवाई में थाना प्रभारी राजेश सातनकर के नेतृत्व में उपनिरीक्षक रामप्रकाश कीर, सहायक उपनिरीक्षक बलीराम बम्हनेले और आरक्षक क्रमांक 490 नारायण जाट की महत्वपूर्ण भूमिका रही।


वन विभाग की नाक के नीचे सरकारी आवास में लकड़ी, फिर भी निगरानी पर सवाल!
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल वन विभाग की निगरानी व्यवस्था को लेकर खड़ा हो रहा है। जब स्वास्थ्य विभाग का आवास वन विभाग की बाउंड्री से लगा हुआ है, तो क्या संबंधित क्षेत्र में नियमित निरीक्षण किया जा रहा था? यदि किया जा रहा था, तो इतनी बड़ी मात्रा में सागौन की लकड़ी सरकारी आवास में रखे होने की जानकारी विभाग को पहले क्यों नहीं मिली? आखिर पुलिस की सूचना और कार्रवाई के बाद ही मामला सामने क्यों आया?

इन परिस्थितियों में वन विभाग के स्थानीय अमले और रेंजर की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि, विभागीय अधिकारियों की लापरवाही या किसी की संलिप्तता अभी प्रमाणित नहीं हुई है। इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।

नेताजी से कनेक्शन की चर्चाएं, लेकिन जांच से ही सामने आएगा सच! स्थानीय स्तर पर इस मामले को लेकर कथित राजनीतिक कनेक्शन की चर्चाएं भी चलने की बात सामने आ रही है। कुछ चर्चाओं में लकड़ी को किसी स्थानीय नेता से जोड़कर देखा जा रहा है, लेकिन अभी तक इसकी पुष्टि करने वाला कोई आधिकारिक तथ्य सामने नहीं आया है। ऐसे में बिना प्रमाण किसी व्यक्ति का नाम जोड़ना उचित नहीं होगा। जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि लकड़ी किसकी थी, सरकारी आवास में किसने रखी और उसका स्रोत क्या था।

अब सवाल—क्या वन विभाग करेगा निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारों पर कार्रवाई? लकड़ी वन विभाग को सौंपे जाने के बाद अब निगाहें विभाग की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। विभाग को लकड़ी के स्रोत, उसे सरकारी आवास में रखने वाले व्यक्ति और संभावित संलिप्त लोगों की पहचान कर नियमानुसार कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि वन विभाग के संबंधित अमले को इसकी जानकारी कब मिली और पहले कोई निरीक्षण किया गया था या नहीं।

भैंसदेही की जनता अब यह जानना चाहती है कि सागौन की लकड़ी के इस मामले में जांच केवल बरामदगी तक सीमित रहेगी या जिम्मेदारों तक भी पहुंचेगी। अगर लकड़ी अवैध रूप से रखी गई थी, तो कार्रवाई केवल लकड़ी जब्त करने तक क्यों सीमित रहे? और यदि निगरानी में चूक हुई है, तो उसकी जवाबदेही किसकी होगी? इन सवालों के जवाब निष्पक्ष जांच और वन विभाग की आधिकारिक प्रतिक्रिया से ही सामने आएंगे।

 में शासकीय आवास से 23 नग सागौन की चरपट बरामद होने के मामले ने अब कई सवाल खड़े कर दिए हैं। स्वास्थ्य विभाग के रिक्त सरकारी आवास में करीब एक लाख रुपये कीमत की सागौन की लकड़ी छिपाकर रखी गई थी। इस मामले में पुलिस और वन विभाग की संयुक्त कार्रवाई में लकड़ी ब(भैंसदेही शंकर राय )बैतूल जिले के भैंसदेही में शासकीय आवास से 23 नग सागौन की चरपट बरामद होने के मामले ने अब कई सवाल खड़े कर दिए हैं। स्वास्थ्य विभाग के रिक्त सरकारी आवास में करीब एक लाख रुपये कीमत की सागौन की लकड़ी छिपाकर रखी गई थी। इस मामले में पुलिस और वन विभाग की संयुक्त कार्रवाई में लकड़ी बरामद की गई, लेकिन सवाल यह है कि जब वन विभाग की बाउंड्री और स्वास्थ्य विभाग का सरकारी आवास एक-दूसरे से सटे हुए हैं, तो आखिर वन विभाग को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? क्या विभाग के मैदानी अमले को इसकी जानकारी नहीं थी, या फिर किसी ने जानबूझकर इस ओर ध्यान नहीं दिया?

पुलिस ने की कार्रवाई, वन विभाग की सक्रियता पर सवाल जानकारी के अनुसार, 8 अक्टूबर 2026 की रात भैंसदेही बीएमओ द्वारा पुलिस को लिखित सूचना दी गई थी कि स्वास्थ्य विभाग के रिक्त शासकीय आवास में इमारती लकड़ी रखी होने की जानकारी मिली है। सूचना मिलते ही भैंसदेही पुलिस मौके पर पहुंची और जांच के दौरान आवास में 23 नग सागौन की चरपट बरामद हुई। पुलिस ने गवाहों की मौजूदगी में पंचनामा तैयार कर लकड़ी जब्त की और आवश्यक वैधानिक कार्रवाई के लिए वन विभाग को सौंप दिया। बरामद लकड़ी की अनुमानित कीमत करीब एक लाख रुपये बताई गई है। इस कार्रवाई में थाना प्रभारी राजेश सातनकर के नेतृत्व में उपनिरीक्षक रामप्रकाश कीर, सहायक उपनिरीक्षक बलीराम बम्हनेले और आरक्षक क्रमांक 490 नारायण जाट की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

वन विभाग की नाक के नीचे सरकारी आवास में लकड़ी, फिर भी निगरानी पर सवाल!

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल वन विभाग की निगरानी व्यवस्था को लेकर खड़ा हो रहा है। जब स्वास्थ्य विभाग का आवास वन विभाग की बाउंड्री से लगा हुआ है, तो क्या संबंधित क्षेत्र में नियमित निरीक्षण किया जा रहा था? यदि किया जा रहा था, तो इतनी बड़ी मात्रा में सागौन की लकड़ी सरकारी आवास में रखे होने की जानकारी विभाग को पहले क्यों नहीं मिली? आखिर पुलिस की सूचना और कार्रवाई के बाद ही मामला सामने क्यों आया? इन परिस्थितियों में वन विभाग के स्थानीय अमले और रेंजर की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि, विभागीय अधिकारियों की लापरवाही या किसी की संलिप्तता अभी प्रमाणित नहीं हुई है। इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।

नेताजी से कनेक्शन की चर्चाएं, लेकिन जांच से ही सामने आएगा सच! स्थानीय स्तर पर इस मामले को लेकर कथित राजनीतिक कनेक्शन की चर्चाएं भी चलने की बात सामने आ रही है। कुछ चर्चाओं में लकड़ी को किसी स्थानीय नेता से जोड़कर देखा जा रहा है, लेकिन अभी तक इसकी पुष्टि करने वाला कोई आधिकारिक तथ्य सामने नहीं आया है। ऐसे में बिना प्रमाण किसी व्यक्ति का नाम जोड़ना उचित नहीं होगा। जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि लकड़ी किसकी थी, सरकारी आवास में किसने रखी और उसका स्रोत क्या था।

अब सवाल—क्या वन विभाग करेगा निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारों पर कार्रवाई? लकड़ी वन विभाग को सौंपे जाने के बाद अब निगाहें विभाग की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। विभाग को लकड़ी के स्रोत, उसे सरकारी आवास में रखने वाले व्यक्ति और संभावित संलिप्त लोगों की पहचान कर नियमानुसार कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि वन विभाग के संबंधित अमले को इसकी जानकारी कब मिली और पहले कोई निरीक्षण किया गया था या नहीं।

भैंसदेही की जनता अब यह जानना चाहती है कि सागौन की लकड़ी के इस मामले में जांच केवल बरामदगी तक सीमित रहेगी या जिम्मेदारों तक भी पहुंचेगी। अगर लकड़ी अवैध रूप से रखी गई थी, तो कार्रवाई केवल लकड़ी जब्त करने तक क्यों सीमित रहे? और यदि निगरानी में चूक हुई है, तो उसकी जवाबदेही किसकी होगी? इन सवालों के जवाब निष्पक्ष जांच और वन विभाग की आधिकारिक प्रतिक्रिया से ही सामने आएंगे।

रामद की गई, लेकिन सवाल यह है कि जब वन विभाग की बाउंड्री और स्वास्थ्य विभाग का सरकारी आवास एक-दूसरे से सटे हुए हैं, तो आखिर वन विभाग को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? क्या विभाग के मैदानी अमले को इसकी जानकारी नहीं थी, या फिर किसी ने जानबूझकर इस ओर ध्यान नहीं दिया?

पुलिस ने की कार्रवाई, वन विभाग की सक्रियता पर सवाल जानकारी के अनुसार, 8 अक्टूबर 2026 की रात भैंसदेही बीएमओ द्वारा पुलिस को लिखित सूचना दी गई थी कि स्वास्थ्य विभाग के रिक्त शासकीय आवास में इमारती लकड़ी रखी होने की जानकारी मिली है। सूचना मिलते ही भैंसदेही पुलिस मौके पर पहुंची और जांच के दौरान आवास में 23 नग सागौन की चरपट बरामद हुई। पुलिस ने गवाहों की मौजूदगी में पंचनामा तैयार कर लकड़ी जब्त की और आवश्यक वैधानिक कार्रवाई के लिए वन विभाग को सौंप दिया। बरामद लकड़ी की अनुमानित कीमत करीब एक लाख रुपये बताई गई है। इस कार्रवाई में थाना प्रभारी राजेश सातनकर के नेतृत्व में उपनिरीक्षक रामप्रकाश कीर, सहायक उपनिरीक्षक बलीराम बम्हनेले और आरक्षक क्रमांक 490 नारायण जाट की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

वन विभाग की नाक के नीचे सरकारी आवास में लकड़ी, फिर भी निगरानी पर सवाल!

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल वन विभाग की निगरानी व्यवस्था को लेकर खड़ा हो रहा है। जब स्वास्थ्य विभाग का आवास वन विभाग की बाउंड्री से लगा हुआ है, तो क्या संबंधित क्षेत्र में नियमित निरीक्षण किया जा रहा था? यदि किया जा रहा था, तो इतनी बड़ी मात्रा में सागौन की लकड़ी सरकारी आवास में रखे होने की जानकारी विभाग को पहले क्यों नहीं मिली? आखिर पुलिस की सूचना और कार्रवाई के बाद ही मामला सामने क्यों आया? इन परिस्थितियों में वन विभाग के स्थानीय अमले और रेंजर की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि, विभागीय अधिकारियों की लापरवाही या किसी की संलिप्तता अभी प्रमाणित नहीं हुई है। इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।

नेताजी से कनेक्शन की चर्चाएं, लेकिन जांच से ही सामने आएगा सच! स्थानीय स्तर पर इस मामले को लेकर कथित राजनीतिक कनेक्शन की चर्चाएं भी चलने की बात सामने आ रही है। कुछ चर्चाओं में लकड़ी को किसी स्थानीय नेता से जोड़कर देखा जा रहा है, लेकिन अभी तक इसकी पुष्टि करने वाला कोई आधिकारिक तथ्य सामने नहीं आया है। ऐसे में बिना प्रमाण किसी व्यक्ति का नाम जोड़ना उचित नहीं होगा। जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि लकड़ी किसकी थी, सरकारी आवास में किसने रखी और उसका स्रोत क्या था।

अब सवाल—क्या वन विभाग करेगा निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारों पर कार्रवाई?लकड़ी वन विभाग को सौंपे जाने के बाद अब निगाहें विभाग की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। विभाग को लकड़ी के स्रोत, उसे सरकारी आवास में रखने वाले व्यक्ति और संभावित संलिप्त लोगों की पहचान कर नियमानुसार कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि वन विभाग के संबंधित अमले को इसकी जानकारी कब मिली और पहले कोई निरीक्षण किया गया था या नहीं।

भैंसदेही की जनता अब यह जानना चाहती है कि सागौन की लकड़ी के इस मामले में जांच केवल बरामदगी तक सीमित रहेगी या जिम्मेदारों तक भी पहुंचेगी। अगर लकड़ी अवैध रूप से रखी गई थी, तो कार्रवाई केवल लकड़ी जब्त करने तक क्यों सीमित रहे? और यदि निगरानी में चूक हुई है, तो उसकी जवाबदेही किसकी होगी? इन सवालों के जवाब निष्पक्ष जांच और वन विभाग की आधिकारिक प्रतिक्रिया से ही सामने आएंगे।

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